Sadhana Shahi

Add To collaction

नारी शक्ति (कविता) प्रतियोगिता हेतु-08-Mar-2024

दिनांक- 08,03, 2024 दिवस- शुक्रवार प्रदत्त विषय- नारी शक्ति( कविता) प्रतियोगिता हेतु

एक नहीं दो-दो मात्राएंँ ,नारी नर पर भारी । उस नारी का जीवन जीना,उस पर ही पड़ गया भारी। एक दिन नारी पूजी जाती थी,था उसका सम्मान। लोपामुद्रा अनसूइया से ,थी उसकी पहचान। श्रद्धा की वो इक मूर्ति थी,आदर की थी खान। अपने पति की अर्धांगिनी थी,दरबार में था सम्मान। निर्मात्री वह थी सृष्टि की,ममत्व गरिमा से मंडित। त्याग -तपस्या से ओत-प्रोत थी,मधुर स्नेह अआच्छादित।

मुगल काल के आते-आते,नारी बन गई दासी। पुरुष उपेक्षा तिरस्कार ही ,अब बस उसकी थाती। घर की दहलीज में कैद हो गई,बेजान तस्वीर की भांँति। अल्पायु में ब्याही जाती,मातृत्व बोझ दबाती। परतंत्रता की बेड़ियांँ पहने,कंगना नहीं सुहाती। वासना पूर्ति की साधन बन गई,बस बनकर रह गई दासी।

नारी की यह दशा देख ,कुछ की आत्मा चित्कारी। पूजित नारी शोषित हो गई,यह विपदा की मारी। दयानंद ने शिक्षित करने का,प्रण ले लिया भारी। बाल विवाह को रोकने की भी,ले लिए ज़िम्मेदारी। राममोहन ने सती प्रथा का,जमकर किया विरोध। नारी को नारी रहने दो,मत लेने दो प्रतिशोध।

1947 के बाद तो ,बड़े-बड़े हुए सुधार। पर यह सब सिर्फ़ कागजी था,शोषित था हर घर -द्वार। बचपन उसका उससे छिन गया ,कैदी बनने को थी मज़बूर। बड़े घरों के बिगड़े बेटों ,का ही है यह दस्तूर। सती, मदालसा आदि विदुषियांँ,यदि तुम लाना चाहो। महिला को शिक्षित करने का,धरती पर अलख जगाओ। महिला दिवस मनाने का,तब तुम सार्थकता पाओ।

साधना शाही वाराणसी

   10
4 Comments

Gunjan Kamal

13-Mar-2024 10:07 PM

बहुत खूब

Reply

Mohammed urooj khan

11-Mar-2024 01:12 PM

👌🏾👌🏾👌🏾

Reply

Varsha_Upadhyay

10-Mar-2024 07:39 PM

Nice

Reply